Physics (NTSE/Olympiad)  

5. मानव नेत्र तथा रंग बिरंगा संसार

याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बिन्दू

कॉर्निया (स्वच्छ मण्डल) : एक पारदश्र्ाी गोलीय झिल्ली जो आँख में प्रकाश को अपवर्तित करती है। कार्निया कहलाती है।
पारितारिका (Iris) : एक गहरी पेशिय डायाफ्राम जो पुतली के आकार को नियंत्रित करता है। पारितारिका कहलाता है।
पुतली : पारितारिका के केन्द्र में एक छोटा वृत्ताकार खुला भाग पुतली कहलाता है। पुतली काली दिखार्इ देती है क्योंकि इससे कोर्इ प्रकाश परावर्तित नहीं होता है।
आँख का लैंस : एक अभिसारी लैंस जो पारदश्र्ाी जैली के समान प्रोटीन के पदार्थ से बना होता है तथा पुतली के पीछे होता है। आँख का लैंस कहलाता है।
रेटिना (दृष्टि पटल) : आँख की गेंद के पिछले (वास्तविक) भाग के अंदर की सतह, जहाँ पर आँख में प्रवेश करने वाला प्रकाश फोकस होता है। रेटिना कहलाता है। रेटिना की सतह लगभग 125 मिलियन प्रकाश संवेदी ग्राहकों से बनी होती है। ये प्रकाश संवेदी ग्राहक रोड्स एवं कोन (शलाका एवं शंकु) कहलाते है। रोड्स प्रकाश की तीव्रता के प्रति संवेदी होते है। जबकि कोनस प्रकाश के रंग के प्रति संवेदी होते है।
वर्णाधता : यह आँख का एक दोष है, जिसके कारण व्यक्ति निश्चित रंगों को विभेछित करने में असमर्थ होता है। वर्णाण्धता एक जेनेटिक बीमारी है।
निकट बिन्दु : सर्वाधिक निकट स्थित बिन्दु जहाँ तक आँख स्पष्ट देख सकती है। उसका निकट बिन्दु कहलाता है।
दूर बिन्द : सबसे दूर स्थित बिन्दू जहाँ तक एक आँख स्पष्ट देख सकती है। उसका दूर बिन्दु कहलाती है। एक सामान्य आँख के लिए, दूर बिन्दु अनन्त पर होता है।
स्पष्ट (अलग-अलग) देखने की न्यूनतम दूरी : वह न्यूनतम दूरी जहाँ तक एक आँख स्पष्ट देख सकती है। स्पष्ट देखने की न्यूनतम दूरी कहलाती है।
एक बालिग व्यक्ति की सामान्य आँख के लिए स्पष्ट देखने की न्यूनतम दूरी 25 cm है।
आँख की समंजन क्षमता : आँख का वह गुण जिसके कारण आँख का लैंस उसकी फोकस दूरी परिवर्तित करने में समर्थ होता है। आँख की समंजन क्षमता कहलाता है। जब आँख किसी दूर स्थित वस्तु पर फोकसित की जाती है, सिलीपरी पेशी सर्वाधिक तनी हुर्इ होती है।
मायोपिआ (निकट दृष्टि दोष) : आँख में वह दोष जिसके कारण आँख दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देखने में समर्थ नहीं होती है यद्यपि वह पास की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकती है। इसे माओपिआ या निकट दृष्टि दोष कहते है।
मायोपिआ आँख की फोकस दूरी में कमी के कारण होता है। इसे उचित फोकस दूरी के अवतल लैंस के चश्में का प्रयोग करके सही किया जा सकता है।
हाइपर मेट्रोपिआ (दूर दृष्टि दोष) : आँख का वह दोष जिसके कारण आँख निकट की वस्तुओं को स्पष्ट देखने में समर्थ नहीं होती है, यद्यपि यह दूर स्थित वस्तुओं को स्पष्ट देख सकती है। इस दोष को हाइपर मेट्रोपिआ या दूर दृष्टि दोष कहते हैं। हाइपरमेट्रोपिआ (दूर दृष्टि दोष) आँख के लैंस की फोकस दूरी में वृद्धि के कारण होता है। इसे उचित फोकस दूरी के उत्तल लैंस से बने चश्में का प्रयोग करके सही किया जा सकता है।
एस्टिगमेटिज्म (दृष्टि वैषम्य) : आँख का वह दोष जिसके कारण प्रकाश की किरणें एक वस्तु के क्षैतिज एवं ऊध्र्वाधर तल से आने वाला प्रकाश समान बिन्दु पर फोकसित नहीं होता है। एस्टिग्मेटिज्म (दृष्टि वैषम्य) कहते हैं। ऐस्टिगमेटिज्म तब होता है जब कोरेना या आँख का लैंस या दोनों पूर्णतया गोलाकार नहीं हो। इसे बेलनाकार लैंसों का प्रयोग करके सही किया जा सकता है।
श्वेत प्रकाश का विक्षेपण : श्वेत प्रकाश का इसके सात अवयवी रंगों में विभक्त होने का प्रक्रम, श्वेत प्रकाश का विक्षेपण कहलाता है। सात रंगों की पट्टी दृश्य प्रकाश का स्पेक्ट्रम कहलाती है।
वर्षा के बाद हवा में झूल रही छोटी बूदों से श्वेत प्रकाश के विक्षेपण के कारण इंद्रधनुष दिखार्इ देता है।
इन्द्रधनुष : वर्षा के बाद, हवा में झूलती हुर्इ छोटी बारिश की बूंदों के द्वारा श्वेत प्रकाश के विक्षेपण के कारण उत्पन्न सात रंगों की पट्टी इंद्रधनुष कहलाती है।
वायुमण्डलीय अपवर्तन : हमारे वायुमण्डल का प्रकाशीय घनत्व ऊँचार्इ के साथ घटता जाता है। इस प्रकार एक प्रकाश किरण, जो वायुमण्डल की किसी परत में प्रवेश करती है, अपवर्तित होती है क्योंकि वह दूसरी परतों से होती हुर्इ आती है। यह वायुमण्डलीय अपवर्तन कहलाता है। वायुमण्डलीय अपवर्तन के कारण कोर्इ रूचिकर प्राकृतिक घटनायें घटित होती है।
प्रकाश का प्रकीर्णन : पृथ्वी का वायुमण्डल गैसों, और कर्इ प्रकार के पदार्थों के कणों से बना होता है। जब इन कणों पर प्रकाश गिरता है, यह सभी दिशाओं में प्रकीर्णित होता है। छोटे कण नीले प्रकाश को लाल प्रकाश की अपेक्षा अधिकता से प्रकीर्णित करते हैं।
बडे़ कण तरंगदैध्र्य के प्रकाश को प्रकीर्णित करते हैं, जैसे कि लाल/नारंगी। बहुत अधिक बडे़ कण, प्रकीर्णित प्रकाश श्वेत प्रतीत होता है।

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