जीव विज्ञान


अध्याय : 6. प्रजनन

लैंगिक प्रजनन

लैंगिक प्रजनन गुणन की एक विधि है जिसमें एक बच्चा युग्मकों के निर्माण एवं संलयन की प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न होता है।
लैंगिक प्रजनन के गुण:
विचलन: गुणसूत्रों के प्रतिस्थापन तथा जीन विनिमय के कारण, लैंगिक प्रजनन से सभी लक्षणों में विचलन आ जाते है। इसलिए दो व्यष्टियां कभी समान नहीं होती हैं।
उर्वरता तथा जनन क्षमता: यह व्यष्टियों की उर्वरता एवं जनन क्षमता को नियमित करता है।
समष्टि की विशिष्टता: लैंगिक प्रजनन के दौरान व्यष्टियों में जीन प्रवाह के कारण, समष्टि की विशिष्टता नियमित रहती है जबकि सभी व्यष्टियों में एक-दूसरे के साथ अधिक समान होती हैं।
उद्विकास: आनुवंशिक बदलाव, लैंगिक जनन से आते है जो नये रूप के उद्विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।
पुष्पोद्भिद पादपों में लैंगिक प्रजनन: एक पुष्प में निम्न भाग होते है।

बाह्यदल: बाह्यदल हरा बाह्यतम पर्ण-समान पुष्पीय अंग है जो कलिका अवस्था में यह पुष्प की रक्षा करता है। परिपक्व अवस्था में यह अन्य पुष्पीय अंगों को सहायता प्रदान करते है।

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