जीव विज्ञान


अध्याय : 6. प्रजनन

रज चक्र

यदि अण्ड निषेचित नहीं होता है, तो ये एक दिन के लिए जीवित रहता है तथा फिर निष्कासित हो जाता हैं। चक्रण के इस समुच्चय को रज अथवा अण्डाशयी चक्र कहते हैं। प्रथम रजोधर्म रजोदर्शन कहलाता है। यह 45–50 वर्ष की आयु के मध्य बंद हो जाता है। रजोधर्म का स्थायी रूप से बंद होना रजोनिवृत्ति कहलाता हैं। रज चक्र चार प्रावस्थाओं में होता है।
रज प्रावस्था:
यह रजोधर्म (मेनसस-ग्रीक शब्द, मोनसम-महीना) अथवा रक्त, श्लेष्मा एवं अंत: स्तरीय अस्तर के निकाष्सन द्वारा लाक्षणित होता है। रज प्रावस्था अंत के 3–5 दिन के लिए होती है।
प्रवलम्बन प्रावस्था :
इसमें अंत: स्तर की मरम्मत एवं वृद्धि होती है। हार्मोन FSH के प्रभाव में कुछ पुटिकाऐं वृद्धि करती है परंतु केवल एक पुटिका जो ग्राफियन पुटिका कहलाती है, दोनों अण्डाशयों में परिपक्व होती है। यह एस्ट्रोजन हार्मोन स्त्रावित करती है। प्रवलम्बन प्रावस्था अंत में 5वें से 14वें दिन तक होती है।
अण्डोत्सर्ग प्रावस्था :
यह रजो चक्र के लगभग मध्य 13वें या 14वें दिन होता है, वृद्धिशील पुटिका फट जाती है तथा परिपक्व अण्ड एस्ट्रोजन व LH के प्रभाव में अण्डाशयन से मुक्त होता है।
स्त्रावी प्रावस्था :
यह अंतिम रज प्रावस्था के मध्य से अंत तक समान रहती है, अर्थात् 14–28 दिन। इस काल के दौरान अण्डाशयी भित्ति पुन: मोटी हो जाती है। अंत: स्तर क्षेत्रा में उपस्थित ग्रन्थियां क्रियाशील हो जाती है तथा यदि ये निषेचित हो जाता है, तो अण्ड के पोषण के लिए पदार्थो का स्त्रावण करती है।

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