Democratic Politics


अध्याय : 4. जाति, धर्म और लैंगिक मसले

जाति के अन्दर राजनीति

राजनीति भी जातियों को राजनीति के अखाड़े में लाकर जाति व्यवस्था और जातिगत पहचान को प्रभावित करती है। इस तरह, सिर्फ राजनीति ही जातिग्रस्त नहीं होती जाति भी राजनीतिग्रस्त हो जाती है। यह चीज अनेक रूप लेती है :
1. हर जाति खुद को बड़ा बनाना चाहती है। सो, पहले वह अपने समूह की जिन उप जातियों को छोटा या नीचा बताकर अपने से बाहर रखना चाहती थी अब उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश करती है।
2. चूँकि एक जाति अपने दम पर सत्ता पर कब्जा नहीं कर सकती इसलिए वह ज्यादा राजनीतिक ताकत पाने के लिए दूसरी जातियों या समुदायों को साथ लेने की कोशिश करती है और इस तरह उनके बीच संवाद और मोल-तोल होता है।
3. राजनीति में नए किस्म की जातिगत गोलबंदी भी हुर्इ हैं, जैसे ‘अगड़ा’ और ‘पिछड़ा’।
4. कुछ खास स्थितियाँ में राजनीति में जातिगत विभिन्नताएं और असमानताएं वंचित और कमजोर समुदायों के लिए अपनी बातें आगे बढ़ाने और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांगने की गुंजाइश भी पैदा करती है। इस अर्थ में जातिगत राजनीति ने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए सत्ता तक पहुँचने तथा निर्णय प्रक्रिया को बेहतर ढंग से प्रभावित करने की स्थिति भी पैदा की है।
5. अनेक पार्टियों और गैर-राजनीतिक संगठन खास जातियों के खिलाफ भेदभाव समाप्त करने, उनके साथ ज्यादा सम्मानजनक व्यवहार करने, उनके लिए जमीन-जायदाद और अवसर उपलब्ध कराने के मांग को लेकर आंदोलन करते रहे हैं।
जैसा कि धर्म के मसले से स्पष्ट होता है, सिर्फ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्रा के लिए शुभ नहीं होती।

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