Democratic Politics


अध्याय : 2. संघवाद

संघीय सरकार के मुख्य लक्षण

संघीय सरकार के मुख्य लक्षण
(i) सत्ता का बँटवारा : संविधान ने मैलिक रूप से दो स्तरीय शासन व्यवस्था का प्रावधान किया था - संघ सरकार (या हम जिसे केन्द्र सरकार कहते हैं) और राज्य सरकारें।
(ii) लिखित एवं अनम्य संविधान : केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच सत्ता का यह बँटवारा हमारे संविधान की बुनियादी बात है। अधिकारों के इस बँटवारे में बदलाव करना आसान नहीं है। अकेले संसद इस व्यवस्था में बदलाव नहीं कर सकती।
(iii) स्वतंत्रा न्यायपालिका : शक्तियों के बँटवारे के संबंध में केर्इ विवाद होने की हालत में फैसला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में ही होता है।
(a) सत्ता का बँटवारा :
संविधान में स्पष्ट रूप से केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी अधिकारों को तीन हिस्से में बाँटा गया है। ये तीन सूचियाँ इस प्रकार है :
1. संघ सूची :
(A) संघ सूची में प्रतिरक्षा, विदेशी मामले, बैंकिग, संचार और मुद्रा जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय हैं।
(B) पूरे देश के लिए इन मामलों में एक तरह की नीतियों की जरूरत है। इसी कारण इन विषयों को संघ सूची में डाला गया है।
(C) संघ सूची में वर्णित विषयों के बारे में कानून बनाने का अधिकार सिर्फ केन्द्र सरकार को है।
2. राज्य सूची :
(A) राज्य सूची में पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि और सिंचार्इ जैसे प्रान्तीय और स्थानीय महत्त्व के विषय है।
(B) राज्य सूची में वर्णित विषयों के बारे में सिर्फ राज्य सरकार ही कानून बना सकती है।
3. समवर्ती सूची :
(A) समवर्ती सूची में शिक्षा, वन, मजदूर - संघ, विवाह, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे वे विषय हैं जो केन्द्र के साथ राज्य सरकारों की साझी दिलचस्पी में आते है।
(B) इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार, दोनों को ही है।
(C) लेकिन जब दोनों के कानूनों में टकराव हो, तो केन्द्र सरकार द्वारा बनाया कानून ही मान्य होता है।
जो विषय इनमें से किसी सूची में नहीं आते वह हमारे संविधान के अनुसार ‘बाकी बचे’ विषय केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्रा में चले जाते है।
‘सबको साथ लेकर’ चलने की नीति मानकर बनी अधिकतर बड़ी संघीय व्यवस्थाओं में साथी इकाइयों को बराबर अधिकार नहीं मिलते। भारतीय संघ के सारे राज्यों को भी बराबर अधिकार नहीं हैं। कुछ राज्यों को विशेष दर्जा प्राप्त है। भारत में जम्मू-कश्मीर एकमात्रा ऐसा राज्य है जिसका अपना संविधान है। इस राज्य के स्थायी निवासियों के अतिरिक्त कोर्इ भी भारतीय नागरिक यहाँ जमीन या मकान नहीं खरीद सकता।
भारतीय संघ की कर्इ इकाइयों को बहुत ही कम अधिकार हैं। ये वैसे छोटे इलाके हैं जो अपने आकार के चलते स्वतंत्रा प्रांत नहीं बन सकते। चंडीगढ़ या लक्षद्वीप अथवा देश की राजधानी दिल्ली जैसे इलाके इसी कोटि में आते हैं और इन्हें केन्द्र शासित प्रदेश कहा जाता है। इन क्षेत्रों को राज्यों वाले अधिकार नहीं हैं। इन इलाकों का शासन चलाने का विशेष अधिकार केन्द्र सरकार को प्राप्त है।
(b) सत्ता की साझेदारी में बदलाव :
अधिकारों के इस बँटवारे में बदलाव करना आसान नहीं है। अकेले संसद इस व्यवस्था में बदलाव नहीं कर सकती। ऐसे किसी भी बदलाव को पहले संसद के दोनों सदनों में दो-तिहार्इ बहुमत से मंजूर किया जाना होता है। फिर कम से कम आधे राज्यों की विधान सभाओं से उसे मंजूर करवाना होता है।
सवैधानिक प्रावधानों और कानूनों के क्रियान्वयन की देख-रेख में न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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