Economics


अध्याय : 3. मुद्रा तथा साख

सहकारी समितियों से ऋण

सहकारी समितियों से ऋण
I. लक्ष्य :
इन समितियों का मुख्य उद्देश्य कम समय तथा इसके सदस्यों के लिए मध्यवर्ती ऋण शर्तें देना है। ये समितियाँ अपने सदस्यों के बीच मितव्ययी बनने की आदत को बढ़ावा देती है।
II. वित्तीय :
इनके मामलों को चलाने के लिए ये समितियाँ विभिन्न स्त्रोतों से साख प्राप्त करती है। ये स्त्रोत दो भागों में विभाजित किये जा सकते है।
(a) आन्तरिक स्त्रोत : इसमें कर्इ स्त्रोत है जैसे प्रवेश शुल्क, शेयर पूंजी, सदस्यों का निक्षेप तथा जमाराशि।
(b) बाह्य स्त्रोत : इसमें सरकार केन्द्रीय वित्तीय संस्थान, भारतीय रिज़र्व बैंक तथा अन्य बाह्य स्त्रोत है।
III. ऋण :
ये समितियाँ उपयोगी उद्देश्यों के लिए इनके सदस्यों को कम समय के लिए ऋण देती है। ये समितियाँ मध्यवर्ती समय ऋण निश्चित सीमा से ऊपर भी दे सकती है।
केन्द्रीय सहकारी बैंक :
ये बैंक सहकारी समिति अधिनियम 1912 के अनुसार स्थापित हुए।
कार्य :
(a) ये बैंक प्राथमिक कृषि समितियों को ब्याज स्वतंत्रा ऋण देती है परन्तु अन्य से ब्याज जमा होता है।
(b) ये बैंक भी सामान्य बैंक के कार्यों की तरह ही कार्य करते हैं, जैसे लोगों से निक्षेप लेना, मुद्रा का विनिमय आदि।
(c) ये बैंक प्राथमिक समितियों की समस्या हल करने में सहायता करती है।

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