Economics


अध्याय : 4. वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

वैश्वीकरण के नकारात्मक पहलू

1. श्रमिकों का शोषण :
वृहद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को विस्तृत वैश्विक सम्पर्क के साथ सस्ती वस्तुओं के लिए उनके लाभ को बढ़ाने के क्रम में देखा जाता है। श्रमिकों को अधिक घण्टे काम करने तथा श्रेष्ठ समय के दौरान नियमित आधार पर राित्रा पाली में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। श्रमिक वैश्वीरकरण द्वारा हुए लाभ के सही साझे के लिए मना करते हैं।
2. कृषि के लिए कम महत्व :
वैश्वीकरण की नर्इ आर्थिक योजना भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्राक के महत्व को नकारती है।
3. निर्धनता उपशमन में असफल :
यह गरीबी की समस्या को सुलझाने में असमर्थ है जो कि भारत की बड़ी आर्थिक समस्या है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया अमीर तथा गरीब के बीच अन्तर को बढ़ाती है।
4. लद्यु उद्योगों के लिए समस्या :
बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उन वस्तुओं के निर्माण में जो लघु पैमाने के लिए आरक्षित थी के उत्पादन में प्रवेशित है। लघु पैमाना उद्योग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की होड़ करने में असमर्थ होते हैं।
5. प्रतिस्पर्धा तथा अनिश्चित रोजगार :
वैश्वीकरण तथा प्रतिस्पर्धा का दबाव श्रमिकों के जीवन को पूर्ण रूप से परिवर्तित करता है बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के विरूद्ध अधिकांश कर्मचारी इन दिनों कार्य करने वाले मजदूरों को ‘लचीले’ बनाते है। इसका अर्थ है कि श्रमिकों की नौकरियाँ अधिक समय तक सुरक्षित नही है।

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