History


अध्याय : 4. मुद्रण, संस्कृति और आधुनिक दुनिया

यूरोप में मुद्रण का आना

(i) 1295 र्इ. में मार्को पोलो नामक महान खोजी यात्राी चीन में काफी साल तक खोज करने के बाद इटली वापस लौटा। चीन के पास वुडब्लॉक (का. की तरख्ती) वाली छपार्इ की तकनीक पहले से मौजूद थी। फिर क्या था, इतालवी भी तख्ती की छपार्इ से किताबें निकालने लगे और जल्द ही यह तकनीक बाकी यूरोप में फैल गर्इ। व्यापारी और विश्वविद्यालय के विद्याथ्र्ाी सस्ती मुद्रित किताबे खरीदते थे।
(ii) किताबों की माँग बढ़ने के साथ-साथ सिर्फ अमीर लोगों के यहाँ सुलेखक या कातिब नहीं पाए जाते थे, बल्कि पुस्तक-विक्रेता भी अब उन्हें रोज़गार देने लगे। आम तौर पर एक विक्रेता के यहाँ 50 कातिब काम करते थे।
हस्तलिखित पांडुलिपियों की सीमायें :
यह किताबों की अबाध बढ़ती माँग से पूरी नहीं होने वाली थी। नकल उतारना बेहद खर्चीला, समय साध्य और श्रम साध्य काम था। पांडुलिपियाँ अक्सर नाजुक होती थीं, उनके लाने ले जाने, रख-रखाव में तमाम मुश्किलें थीं। इसलिए उनका सर्कुलेशन – (चलन, गश्त) सीमित रहा।
अत: वुडब्लॉक प्रिंटिंग (तख्ती की छपार्इ) उत्तरोत्तर लोकप्रिय होता गया।

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