History


अध्याय : 4. मुद्रण, संस्कृति और आधुनिक दुनिया

शुरुआती छपी किताबे

(i) मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुर्इ। यह छपार्इ हाथ से होती थी। तकरीबन 594 र्इ. से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख्ती पर कागज को रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं। चूँकि पतले, छिद्रित कागज के दोनों तरफ छपार्इ संभव नहीं थी, इसलिए पारंपरिक चीनी किताब एकॉर्डियन शैली में किनारों को मोड़ने के बाद सिल कर बनार्इ जाती थी। किताबों का सुलेखन या खुशनवीसी करने वाले लोग दक्ष सुलेखक या खुशखत होते थे, जो हाथ से बड़े सुंदर-सुडौल अक्षरों में सही-सही कलात्मक लिखार्इ करते थे।
(ii) एक लंबे अरसे तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक चीनी राजतंत्रा था। सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त चीन की नौकरशाही भी विशालकाय थी, तो चीनी राजतंत्रा इन परीक्षाओं के लिए बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था। सोलहवीं सदी में परीक्षा देनो वालों की तादाद बढ़ी, लिहाजा छपी किताबों की मात्रा भी उसी अनुपात में बढ़ गर्इ।
(iii) सत्राहवीं सदी तक आते-आते मुद्रित सामग्री के उपभोक्ता सिर्फ विद्वान और अधिकारी नहीं रहे। व्यापारी अपने रोजमर्रा के कारोबार की जानकारी लेने के लिए मुद्रित सामग्री का इस्तेमाल करने लगे। पढ़ना एक शगल भी बन गया। नए पाठक वर्ग को काल्पनिक किस्से, कविताएँ आत्मकथाएँ, शास्त्राीय साहित्यिक कृतियों के संकलन और रुमानी नाटक पसंद थे।
(a) जापान में मुद्रण :
(i) चीनी बौद्ध प्रचारक 768-770 र्इ. के आसपास छपार्इ की तकनीक लेकर जापान आए।
(ii) जापान की सबसे पुरानी, 868 र्इ. में छपी, पुस्तक 'डायमंड सूत्रा' है, जिसमें पाठ के साथ-साथ काठ पर खुदे चित्रा है।
(iii) तस्वीरें अकसर कपड़ों, ताश के पत्तों और कागज के नोटों पर बनार्इ जाती थीं।
(iv) मध्यकालीन जापान में कवि भी छपते थे और गद्यकार भी, और किताबें सस्ती और सुलभ थीं
(v) अठारहवीं सदी के अंत में, एदो (बाद में जिसे तोक्यो के नाम से जाना गया), के शहरी इलाके की चित्राकारी में शालीन शहरी संस्कृति का पता मिलता है जिसमें हम चायघर के मजमों, कलाकारों और तवायफों को देख सकते है।

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